अपनी ज़िंदगी के अलग ही उसूल हैं, यार की खातिर तो काँटे भी काबुल हैं हँस कर चल दू काँच के टुकड़ो पर भी, .अगर यार कहे ये मेरे बिच्छाए हुए फूल है

02-05-2015 0 Answers
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